निःशब्द
पूछने को सवाल बहुत है तुमसे पर क्या तुम जवाब दे पाओगे ये वही सवाल है जो तुमसे ही बुने है, तुम्हे हैरान होने की जरूरत नही है तुम तो सबसे बेहतर जानते हो मुझे इसलिए सवालों का तूफ़ान जो मेरे अंदर पनप रहा है वो कही न कही लाज़मी है, हर बार की तरह आज भी मैं जानती हूँ की तुम्हारे सामने बैठते ही मैं खुद से अलहदा हो जाऊँगी। ये शहर ये गलियाँ ये मकान ये कमरा ये सब तो मुझे बाद निहारते है सबसे पहले तो मैं तुमसे रूबरू होती हूँ, अब तुमसे ना बात किए एक अरसा बीत गया है तो ये उमड़ते सवाल मानो की चीर रहे हो मुझे। तुम्हारे मेरे बीच ये जो दीवार खड़ी है उसकी परत इतनी मज़बूत हो चुकी है की ना तुम मुझे देख पा रहे ना मैं तुम्हे, अँधियारे का ये मंज़र गेहरा होते जा रहा है। खैर इधर उधर की बात छोड़ो ये बताओ कि जब मैं तुम्हारे सामने बैठ के चीख रही थी कि मुझे तुम्हारी जरूरत है, मैं दर्द में हूँ, तुम निशब्द क्यों थे तब? मेरी चीख उस दीवार के पार तुम्हारे कानों तक पहुंची भी थी ? या फिर सुन कर भी अनसुना कर दिया था तुमने। अब फिर ये चुप्पी, पता था नही दोगे जवाब कुछ आसान सा ही सवाल पूछ लेती हू...