ख़्वाबों का सितंबर
सिंतबर का महीना हर किसी के मन को लुभा देने वाला महीना होता है। इस महीने की झोली में हर रंग के सपने हर किसी को मिल जाते है। ऐसा ही एक रंग बिरंगा ख़्वाब मुझे भी पिछले सितंबर मिला था। हाँ, ख़्वाब ही बोलूंगी मैं उसे क्योंकि हकीक़त में उस ख़्वाब का दीदार करना मुझको मना था। वो शाम का वक्त और सर्द हवा दोपहर की गरमाहट को नज़रअंदाज़ कर देती थी, अब बात दोपहर की है या दो पहर के बाद की, मुझे इस साल भी ख़बर नही है। मेरी यादों के बुलबुले में आज भी वह शाम क़ैद है जब वो और मैं पहली बार एक दूसरे से रूबरू थे। हालांकि मेरी उसके करीब आने की बेताबी तो मेले के उस झूले पर ही नज़र आ गई थी उसे, जब झूले की तेज़ रफ़्तार में हवा के झोंके से मेरे बाल उसके चेहरे पर उड़ रहे थे और उसे हटाने वाली ना मैं थी ना वो,पर शायद उसकी वजह यह भी थी कि हम दोस्त थे और दोस्ती में तो बड़ी से बड़ी गुस्ताख़ी माफ़ होती है, मैंने तो सिर्फ ज़ुल्फो को आज़ाद छोड़ा था। इस महीने शहर के कोने कोने में मेले लगे रहे हैं, नवरात्रि के 9 दिन मेलों की रौनक और बिन मौसम बरसात होने पर भीगी हुई मिट्टी की खुशबू इस महीने की खासियत और मेरे और उसके मिलने का एक बहाना।...