अनचाही गली
जो दिल में छुपा होता है वो आँखों में नज़र आता है। आँखों से बोली हुई बातों को झुठलाना किसी आम इंसान के बस की नहीं है, यह सिर्फ वही कर सकता है जिसे बातों और आँखों से बेहतरीन खेलना आता हो, किसी शतरंज के खिलाड़ी की तरह क्योंकि सत्य का कोई रूप नहीं होता है सिर्फ नज़रिया होता है, जैसे ही नज़रिया बदला सत्य अपने आप बदल जाता है। मैं हर रोज़ की तरह सत्य और झूठ के बीच का फर्क जानने के लिए ख़ान चाचा के दुकान पर पहुंच गई। यहाँ की शाम और हाथ में कुल्हड़ वाली चाय पूरे बनारस में कहीं नहीं मिलती है। चाचा की कड़क बोली और मीठी मुस्कुराहट के पीछे छुपा राज़ किसी को नहीं पता होता है। "आज लेट हो गए बेटा, लगता है ऑफिस में काम ज़्यादा था" चेहरे पर मुस्कुराहट और बोली में गुस्सा झलकाते हुए चाचा ने कहा। मैं चाय की गर्म घुट लेते हुए चाचा की तरफ देख हसने लगी "मैं इतने साल में भी आपको समझ नहीं पाई"। वह मेरे बगल में आ कर बैठ गए और मेरे पीठ पर थप्पी मारते हुए कहते "बेटे उम्र का फासला भी तो बहुत है, वक्त के साथ साथ खुद को भी समझ जाओगी और मुझे भी"। मेरे नज़रे कभी भी एक जगह स्थिर नहीं रहती, वह चार...