निःशब्द

पूछने को सवाल बहुत है तुमसे पर क्या तुम जवाब दे पाओगे ये वही सवाल है जो तुमसे ही बुने है, तुम्हे हैरान होने की जरूरत नही है तुम तो सबसे बेहतर जानते हो मुझे इसलिए सवालों का तूफ़ान जो मेरे अंदर पनप रहा है वो कही न कही लाज़मी है, हर बार की तरह आज भी मैं  जानती हूँ की तुम्हारे सामने बैठते ही मैं खुद से अलहदा हो जाऊँगी। ये शहर ये गलियाँ  ये मकान ये कमरा ये सब तो मुझे बाद निहारते है सबसे पहले तो मैं तुमसे रूबरू होती हूँ, अब तुमसे ना  बात किए एक अरसा बीत गया है तो ये उमड़ते सवाल मानो  की चीर  रहे हो मुझे। तुम्हारे मेरे बीच ये जो दीवार खड़ी है उसकी परत इतनी मज़बूत हो चुकी है की ना तुम मुझे देख पा रहे ना मैं तुम्हे, अँधियारे का ये मंज़र गेहरा होते जा रहा है।
खैर इधर उधर की बात छोड़ो ये बताओ कि जब मैं तुम्हारे सामने बैठ के चीख रही थी कि मुझे तुम्हारी जरूरत है, मैं दर्द में हूँ, तुम निशब्द क्यों थे तब? मेरी चीख उस दीवार के पार तुम्हारे कानों  तक पहुंची भी थी ? या फिर सुन कर भी अनसुना कर दिया था तुमने। अब फिर ये चुप्पी, पता था नही दोगे जवाब कुछ आसान सा ही सवाल पूछ लेती हूँ।
क्या तुम्हारे मन में मेरी आज भी वही तस्वीर है जिसे सबसे पहली दफ़ा देखा था तुमने? क्या आज भी तुम मुझे उतना ही मज़बूत समझते हो जितना पहले बड़े गुरुर से समझते थे? क्या आज भी मेरे आँखों में तुमसे आंसू नही देखे जाते? क्या आज भी मैं रोते हुए बुरी लगती हूँ? क्या आज भी तुम मुझे देख के यह महसूस करते हो कि मैं कितनी बहादुर हूँ? क्या आज भी तुम्हे लगता है की तुम कभी साथ नही छोड़ कर जाओगे?
क्या तुम्हे अपने वादे याद है? क्या तुम्हे वो तस्वीर याद है जिसमें हम दोनों एक दुसरे की ओर देख रहे हैं और फिर हम दोनों हंस पड़े की हम कितने एक जैसे हैं, याद है? वो पल याद है तुम्हे जब तुम कहते थे की मेरी जगह किसी को नही दोगे? अच्छा वो याद है तुम्हे किस तरह तुम मुस्कुरा कर हमेशा कहते थे कि तुम साथ हो मेरे?
कुछ तो बोलो भूल गये क्या तुम?
बस यही मेरे बढ़ते सवालों के साथ जो तुम्हारी चुप्पी गहरा जाती है, ऐसा लगता है आसमान में तारे कई है पर चमक कोई भी नहीं रहा ये ठीक साल के उस मौसम जैसा है जिसकी हवा ना रूह को ठंडक देती है ना गर्मी।
इसीलिए कुछ पूछती नही हूँ तुमसे, पता है तुम मौन हो जाओगे एकदम चुप और मौन टूटते ही तुम गुस्से में सारा गुब्बार निकलोगे और दो पल में गिर के टूट जाओगे, क्योंकि तुम तो आईना हो ज्यादा दबाव तो तुम ले ही नहीं सकते और फिर ये जो बिखरे हुए तुम्हारे कांच है ये चुभते भी मुझे है, खून भी मेरा ही बहता है। लेकिन तुम्हे तो ये समझ ही नही आता ही कांच चुभता है तो बहुत दर्द होता है और यह दर्द बहुत गहरा होता है। इतना गहरा जिसका निशान सदियों तक ताज़ा रहता है, तभी सब कहते है की आईना सच की परछाई होता है और मेरा सच तो यूँ निःशब्द हो गया की तुम्हारे सामने बैठ कर एक वक़्त घंटों बातें कर  लिया करती थी और अब देखो मेरी आँखें नम हैं तो तुम भी चुप हो।
हँ हर सुबह तुम्हे देखती हूँ,और तुम भी मुझे एक जुट देखते हो जैसे मेरी परछाई। तुम्हे देख कर रूठ जाती हूँ और पल भर में  खिलखिलाती भी जाती हूँ। कभी एक जुट तुम्हें देखती हूँ, ओर चेहरे की हालत देख चिल्लाती भी हूँ क्यूँकि  तुमने ही तो मुझे हर हालत में देखा है। जब तुम चुप हो जाते हो तो मैं घबरा जाती हूँ  पर मुझे ख़बर  ना थी कि तुम्हारी चुप्पी ही मेरे हर सवालों का जवाब है।
                                                            आकांक्षा

Comments

  1. अति उत्तम ! आकांक्षा जी ! आप की लेखन शैली बहुत ही उम्मदा है, दिल को झकझोर देता है ! आप अपने प्रेम को यू शब्दों में इस तरह पिरो देती है । जैसे लगता है किसी ने अपना कलेजा निकाल के रख दिया हो !

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