ख़्वाबों का सितंबर
सिंतबर का महीना हर किसी के मन को लुभा देने वाला महीना होता है। इस महीने की झोली में हर रंग के सपने हर किसी को मिल जाते है। ऐसा ही एक रंग बिरंगा ख़्वाब मुझे भी पिछले सितंबर मिला था। हाँ, ख़्वाब ही बोलूंगी मैं उसे क्योंकि हकीक़त में उस ख़्वाब का दीदार करना मुझको मना था। वो शाम का वक्त और सर्द हवा दोपहर की गरमाहट को नज़रअंदाज़ कर देती थी, अब बात दोपहर की है या दो पहर के बाद की, मुझे इस साल भी ख़बर नही है। मेरी यादों के बुलबुले में आज भी वह शाम क़ैद है जब वो और मैं पहली बार एक दूसरे से रूबरू थे। हालांकि मेरी उसके करीब आने की बेताबी तो मेले के उस झूले पर ही नज़र आ गई थी उसे, जब झूले की तेज़ रफ़्तार में हवा के झोंके से मेरे बाल उसके चेहरे पर उड़ रहे थे और उसे हटाने वाली ना मैं थी ना वो,पर शायद उसकी वजह यह भी थी कि हम दोस्त थे और दोस्ती में तो बड़ी से बड़ी गुस्ताख़ी माफ़ होती है, मैंने तो सिर्फ ज़ुल्फो को आज़ाद छोड़ा था।
इस महीने शहर के कोने कोने में मेले लगे रहे हैं, नवरात्रि के 9 दिन मेलों की रौनक और बिन मौसम बरसात होने पर भीगी हुई मिट्टी की खुशबू इस महीने की खासियत और मेरे और उसके मिलने का एक बहाना। उसे भी मेले से उतना ही प्यार था जितना मुझे, अस्ल में उस मेले ने हम दोनों के ही ज़िंदगी में अलग-अलग कहानी लिख दी थी। एक शाम, एक कहानी, दो किरदार और वो मेले की रौनक। मेरा उससे ज़िद करना और ज़िद कर के उसे उस रात अपने पास रोक लेना।
आज भी वो रात मेरे ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत रात है, जब उसकी निगाहों में अपने लिए इज़्ज़त देखी थी मैंने। इज़्ज़त को प्यार का दर्जा नही दिया कभी, और उस इज़्ज़त पर आज भी हज़ार बार मेरी जान निसार है। उसकी धड़कन की रफ्तार और लबों की थरथराहट को बेहद करीब से महसूस किया था मैंने । जब मैं और वो इतने करीब थे जितना एक लेखक अपनी कलम से होता है। रात का वक्त कब बीत गया इसकी ख़बर नही थी मुझे उसकी बाहों में जो राहत मिली थी उसका एक एक पल याद है मुझे। यूँ तो हर रात के बाद सुबह हो ही जाती है, पर शायद उस दिन बस सुबह मेरे लिए ही हुई थी, उसके लिए तो अब भी अंधेरा ही था। हम दोनों एक दूसरे के हर रूप से करीब थे। उस सुबह भी दुनिया से नज़रे चुरा कर दो चार लम्हे हमने साथ गुज़ार ही लिए थे। वो लम्हे जिसके बाद शायद सब कुछ बदल गया। हमारे बीच का रिश्ता भी। मैं प्यार करती रही वो दोस्ती कहता गया, मैं इज़हार करती रही वो इनकार करता गया, हालांकि उसके इस इनकार का कोई मलाल नही था मुझे। हमारे बीच के रिश्ते की ख़बर मुझे और उसे बख़ूबी थी।
उसकी नज़रो में इज़्ज़त और प्यार जो पाया था मैंने, उसकी तड़प भी सदियों से की थी। मैंने उसका नज़रे चुराने से ले कर नज़रे मिलाने तक का सफर देखा है, उसका हाथ पकड़ने से हाथ छुड़ाने तक का सफ़र देखा है, साथ चलने से दूर जाने तक का सफ़र देखा है, हर एक सफ़र में उसका राही बन के देखा है। मेरे घर में उसके आंखों से बहे हर एक अश्क़ की निशानी को देखा है मैंने, उनमे छुपी कई कहानियों को देखा है मैंने। आज एक साल बाद, दूर से जब उस झूले को देखा तो उन कहानियों की हर एक बात तस्वीर की तरह सामने आ गई जो एक बुलबुला बने एक अरसे से मेरे अंदर रह गई है, जिस बुलबुले को मैं कभी फूटने नही देना चाहती। वो जो कल तक मेरी पहलू में बैठा करता था वो आज गैरों की दुनिया में जी रहा है।
उसके हसीन चेहरे की क्या तारीफ करूँ मैं तो उसकी मासूम निगाहों से ही घायल थी। उसकी तस्वीर पर आज भी काला टीका लगा रखा है, कहीं नज़र मेरी खुद की भी ना लग जाए उसे। उसकी हर एक अदा पर लूटने वाले हज़ार थे, आगोश में मेरे साथ बिताई बस कुछ ही रात थी। मेरा अब मुझ में कुछ भी नहीं जो रह गया है उसका ही है सब कुछ। अब तो साकी भी सवाल पूछ लेता है हर वक्त रास्ता भटक जाती हो या घर नही है कोई। कभी कभी मुस्कुरा कर मैं भी जवाब दे दिया करती हूँ,ना रास्ता भटकी हूँ ना भूली हूँ ,घर तो बस उसके तबस्सुम का है अक्सर जहां शराब के दो घुट से बिता लेती हूँ दो पहर।
इस महीने शहर के कोने कोने में मेले लगे रहे हैं, नवरात्रि के 9 दिन मेलों की रौनक और बिन मौसम बरसात होने पर भीगी हुई मिट्टी की खुशबू इस महीने की खासियत और मेरे और उसके मिलने का एक बहाना। उसे भी मेले से उतना ही प्यार था जितना मुझे, अस्ल में उस मेले ने हम दोनों के ही ज़िंदगी में अलग-अलग कहानी लिख दी थी। एक शाम, एक कहानी, दो किरदार और वो मेले की रौनक। मेरा उससे ज़िद करना और ज़िद कर के उसे उस रात अपने पास रोक लेना।
आज भी वो रात मेरे ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत रात है, जब उसकी निगाहों में अपने लिए इज़्ज़त देखी थी मैंने। इज़्ज़त को प्यार का दर्जा नही दिया कभी, और उस इज़्ज़त पर आज भी हज़ार बार मेरी जान निसार है। उसकी धड़कन की रफ्तार और लबों की थरथराहट को बेहद करीब से महसूस किया था मैंने । जब मैं और वो इतने करीब थे जितना एक लेखक अपनी कलम से होता है। रात का वक्त कब बीत गया इसकी ख़बर नही थी मुझे उसकी बाहों में जो राहत मिली थी उसका एक एक पल याद है मुझे। यूँ तो हर रात के बाद सुबह हो ही जाती है, पर शायद उस दिन बस सुबह मेरे लिए ही हुई थी, उसके लिए तो अब भी अंधेरा ही था। हम दोनों एक दूसरे के हर रूप से करीब थे। उस सुबह भी दुनिया से नज़रे चुरा कर दो चार लम्हे हमने साथ गुज़ार ही लिए थे। वो लम्हे जिसके बाद शायद सब कुछ बदल गया। हमारे बीच का रिश्ता भी। मैं प्यार करती रही वो दोस्ती कहता गया, मैं इज़हार करती रही वो इनकार करता गया, हालांकि उसके इस इनकार का कोई मलाल नही था मुझे। हमारे बीच के रिश्ते की ख़बर मुझे और उसे बख़ूबी थी।
उसकी नज़रो में इज़्ज़त और प्यार जो पाया था मैंने, उसकी तड़प भी सदियों से की थी। मैंने उसका नज़रे चुराने से ले कर नज़रे मिलाने तक का सफर देखा है, उसका हाथ पकड़ने से हाथ छुड़ाने तक का सफ़र देखा है, साथ चलने से दूर जाने तक का सफ़र देखा है, हर एक सफ़र में उसका राही बन के देखा है। मेरे घर में उसके आंखों से बहे हर एक अश्क़ की निशानी को देखा है मैंने, उनमे छुपी कई कहानियों को देखा है मैंने। आज एक साल बाद, दूर से जब उस झूले को देखा तो उन कहानियों की हर एक बात तस्वीर की तरह सामने आ गई जो एक बुलबुला बने एक अरसे से मेरे अंदर रह गई है, जिस बुलबुले को मैं कभी फूटने नही देना चाहती। वो जो कल तक मेरी पहलू में बैठा करता था वो आज गैरों की दुनिया में जी रहा है।
उसके हसीन चेहरे की क्या तारीफ करूँ मैं तो उसकी मासूम निगाहों से ही घायल थी। उसकी तस्वीर पर आज भी काला टीका लगा रखा है, कहीं नज़र मेरी खुद की भी ना लग जाए उसे। उसकी हर एक अदा पर लूटने वाले हज़ार थे, आगोश में मेरे साथ बिताई बस कुछ ही रात थी। मेरा अब मुझ में कुछ भी नहीं जो रह गया है उसका ही है सब कुछ। अब तो साकी भी सवाल पूछ लेता है हर वक्त रास्ता भटक जाती हो या घर नही है कोई। कभी कभी मुस्कुरा कर मैं भी जवाब दे दिया करती हूँ,ना रास्ता भटकी हूँ ना भूली हूँ ,घर तो बस उसके तबस्सुम का है अक्सर जहां शराब के दो घुट से बिता लेती हूँ दो पहर।
आकांक्षा

😇
ReplyDeleteSuprb
DeleteWahhhhhh 🤩
ReplyDeleteOne day your father will be known by your name Akansha, good going 😊
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