Is everything OK?


कुछ कह देना,कुछ सुन लेना
कल और आज पर किसका है नाम?  
कुछ भूल जाना, कुछ भुला देना
किसका यहाँ क्या है काम?


Is everything ok?
वह मुस्कुराई और आँसुओ को पोछते हुए मेरी तरफ देख के कहती, "इस सवाल का जवाब देना क्या उतना ही आसान होता है, जितना यह सवाल पूछ लेना" इससे पहले कि मैं उससे आगे कुछ बोलती वह अपने खुले बिखरे बालों को समेटते हुए आगे निकल गई।
मैं वहीं खड़ी उसे निहार रही थी और मन ही मन एक ही ख्याल चलते जा रहा था, की एक सवाल जो मैंने उससे पूछा और जवाब में उसने एक नया सवाल मुझे सौंप दिया। मैंने ख्यालों की दुनिया में ज्यादा वक्त ना बर्बाद करते हुए उसके पीछे भागते हुए  उसे रोकने की आवाज़ लगाई "एक्सक्यूज़ मी मैम" वह झटके से पीछे मुड़ी और अपने हाथ में पकड़ी हुई किताब को बैग में रखते हुए मुझसे कहा "जी बोलिए"?
मैं चुप एकदम मौन जैसे मेरे मुँह में शब्द अटक गए हो, मैं बोलना चाहती थी पर मुह से कोई आवाज़ ही नही निकल पा रही थी। "अ, मैं, आप " बस यही चंद शब्द थे जो मैं कह के चुप हो गई। वह शायद मेरी चुप्पी में छुपी हुई बात को समझ गई थी, मेरा उसके पीछे भाग के आने का मकसद जान गई थी वह।
"क्या हुआ जवाब ने सवाल बन के आपको भी उलझा दिया" यह बोलते हुए उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए मेरा हाथ पकड़ कर कहा "let's talk"। मेरे पास बात करने को कुछ भी नही था लेकिन फिर भी मैं उससे बात करना चाहती थी, एक खुशी सी मिल रही थी मुझे जैसे किसी बड़ी बहन ने मुझे सीने से लगा लिया हो। एक बहन की कमी मैंने हमेशा महसूस की है, ख़ासकर की तब जब मैं खुद में ही उलझ जाती हूँ जैसे अक्सर रेशम के धागे उलझ जाते है।
" एंग्जायटी एक ऐसा शब्द होता है जो बहुत से लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाता है, और उन्हें खुद को भी एहसास नहीं होता कि वह इस शब्द के साथ अपनी ज़िंदगी बाट रहें हैं। बाहर से सब कुछ आम होता है जैसे एक नार्मल इंसान जीता है, जीवित रहने के लिए पर सच केवल उस इंसान का अकेलापन जानता है जहाँ वह रह-रह कर खुश होता है तो अगले ही पल रोने लगता है, हलक तक बातें अटक जाती है और वह अल्फ़ाज़ का रूप कभी नही ले पाती। भीड़ को देख कर छुप जाना, बहानों के साथ किनारा पाना ज़िंदगी की रूटीन की तरह हो जाता है जैसे शुबह उठ के ब्रश करना, मुह धोना और तैयार होना। अक्सर लोग एंग्जायटी को 'दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा' कह कर नज़रअंदाज़ कर देते है। मेरे माँ-बाप, दोस्त, प्यार  इन्होंने भी मुझे यही बोल कर नज़रअंदाज़ कर दिया और आज मैं इसके साथ अपनी ज़िंदगी बाँट रही हूँ जैसे मैं और मेरी एंग्जायटी साथी बन गए हो। मैं चाहती थी उनसे सच कहना उन्हें बताना की मैं क्या महसूस कर रही हूँ, मैं  क्या चाहती हूँ पर उनके पास सुनने को वक्त ही नही था, बस एक दूसरे से भागते रहे कभी मैं उनसे कभी वह मुझसे। प्यार चाहती थी मैं उनका, केअर चाहती थी। क्या यह सब चाहना गलत था? क्या मेरा उनसे प्यार की उम्मीद रखना ग़लत था? खैर हाथों की पांचो उंगलियाँ एक बराबर नही होती, मेरी कहानी से तुम अपने ज़िंदगी के किरदार  को जज मत करना। तुम्हारी मुस्कुराहट देख कर ऐसा लगता है कि तुम बहुत ख़ुशनसीब हो, अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो बेख़ौफ़ होती जैसे मैं होना चाहती थी पर मैंने बहुत देर कर दी अपने आप को समझने में, अपने आप को इज़्ज़त देने में। तुम और मैं अजनबी है पर तुमसे बातें कर के एक अपनापन सा लग रहा है, शायद अगर मेरी कोई छोटी बहन होती तो वह तुम्हारी जैसी ही होती " यह कहते हुए उसने मुझे गले लगा लिया।
मेरे अटके हुए लफ्ज़ आँसूओ में तब्दील हो गए। मैं वहाँ से चली जाना चाहती थी, की बस भाग जाऊँ और जी भर के रो लूँ। पर मैं भागती कहाँ ठहरने का कोई ठिकाना ही नही था। जाते जाते वह मुझे एक प्यारी सी मुस्कान के साथ छोड़ गई, ना ही उसने मुझसे मेरा नाम पूछा और ना मैंने उससे। बस दोनो अपने अपने रास्ते निकल गए।

कुछ बातें जो हलक में अटक जाती है
वह इंसान नही रूह को तलाशती है।
                 
                                                               - आकांक्षा

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