अनचाही गली

जो दिल में छुपा होता है वो आँखों में नज़र आता है। आँखों से बोली हुई बातों को झुठलाना किसी आम इंसान के बस की नहीं है, यह सिर्फ वही कर सकता है जिसे बातों और आँखों से बेहतरीन खेलना आता हो, किसी शतरंज के खिलाड़ी की तरह क्योंकि सत्य का कोई रूप नहीं होता है सिर्फ नज़रिया होता है, जैसे ही नज़रिया बदला सत्य अपने आप बदल जाता है।
मैं हर रोज़ की तरह सत्य और झूठ के बीच का फर्क जानने के लिए ख़ान चाचा के दुकान पर पहुंच गई। यहाँ की शाम और हाथ में कुल्हड़ वाली चाय पूरे बनारस में कहीं नहीं मिलती है। चाचा की कड़क बोली और मीठी मुस्कुराहट के पीछे छुपा राज़ किसी को नहीं पता होता है। "आज लेट हो गए बेटा, लगता है ऑफिस में काम ज़्यादा था" चेहरे पर मुस्कुराहट और बोली में गुस्सा झलकाते हुए चाचा ने कहा। मैं चाय की गर्म घुट लेते हुए चाचा की तरफ देख हसने लगी "मैं इतने साल में भी आपको समझ नहीं पाई"। वह मेरे बगल में आ कर बैठ गए और मेरे पीठ पर थप्पी मारते हुए कहते "बेटे उम्र का फासला भी तो बहुत है, वक्त के साथ साथ खुद को भी समझ जाओगी और मुझे भी"।
मेरे नज़रे कभी भी एक जगह स्थिर नहीं रहती, वह चारों तरफ  घूमती रहती है जैसे किसी सफ़र को तय कर रही होती हैं। चाचा की दुकान पर बैठ कर मैं अपनी नज़रों से चारों तरफ किसी अंजान कहानी को टटोलती रहती हूँ, मुझे हर चीज़ ठहरी हुई नज़र आती है, मानो सामने यह जो बड़ी सी आईटी की बिल्डिंग है उसमें काम करने वाले लोग एक जगह रुके हुए हैं, अन्य दुकानों के दुकानदार खाली बैठ कर सड़कों को निहार रहें हो, गाड़ियां चलनी बंद हो चुकी हो,  सभी रिक्शेवाले एक जगह एक जुट हो कर कोई कार्य नहीं कर रहें हो। हर कोई मुझे ठहरा हुआ नज़र आता है सिर्फ मेरे मन के अलावा, मेरा मन किसी अजनबी सफ़र के बीच में फसा पड़ा है और भागते जा रहा है।
मेरे नज़र के खाली रोड पर सामने से एक लड़की भागते हुए आती है और हड़बड़ी में अपने बैग से कुछ पैसे निकाल कर कहती "चाचा एक एडवांस देना, साथ मे एक कप चाय भी" ऐसा लग रहा था बहुत जल्दी में थी पर जैसे ही उसने चाय की कप ली और सिगरेट को सुलगाया वह बड़े ही आराम से कुर्सी को खींच कर मेरे ही टेबल पर सामने बैठ गई। यह अंदाज़ उसका बेहद बेपरवाह अंदाज़ व्यतीत कर रहा था जैसे कहीं जाने की जल्दी ना हो। उसके चेहरे पर किसी चोट का निशान था किसी कुचले हुए फूल की तरह, वह अपने बैग से एक डायरी निकालती और उसमें कुछ लिखने लगी, शायद अपने मन के संन्नाटे को चीख कर शब्दों का रूप दे रही थी। मैं उसकी तरफ लगातार देखे जा रही थी बिना पलकें झुकाए मेरे आँखों में उसकी एक तस्वीर सी बनने लगी थी, पर मेरे घूरने का उसके ऊपर कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था वो अपने काम में इतनी व्यस्त थी कि कौन किस नज़र से देख रहा है क्यों देख रहा है उससे उसे कोई मतलब नहीं था। अपने डायरी के आखरी पन्नों पर वह थी, किसी अधूरे किस्से को पूरा करने में लगी थी। इतने में उसके फ़ोन की घंटी बजी "हेलो, हँ  मैं अभी आती हूँ बस पांच मिनट में" यह बोल कर उसने फ़ोन रख दिया और जल्दी से अपनी डायरी बैग में रखती और वहाँ से निकल गई। कहीं पहुंचने की जल्दी में उसने अपने डायरी से गिरे हुए पन्नों पर ध्यान नहीं दिया, उसके जाते ही मैंने उन पन्नों को उठाया और उसके पीछे जाने लगी। तभी चाचा की पीछे से आवाज़ आई "बेटे कहाँ जा रही है इतने जल्दी में"। मैंने चिल्ला कर बोला "चाचा कहानी मिल गई, वापस मिल कर बताती हूँ"
वह दुर्गाकुंड जाने के लिए ऑटो लेती और मैं उसके पीछे पीछे दूसरे ऑटो में बैठ जाती। मैं चाहती तो उसे आवाज़ लगा कर वहीं वह पन्नो को उसे थमा देती पर मैंने ऐसा नहीं किया, मैं उसके पीछे जाना चाहती थी, जानना चाहती थी उसके बारे में जैसे वो कोई रहस्य हो और उसके धागों को मैं सुलझाना चाहती हूँ। मैंने अपनी सिगरेट जलाई और उसके धुंए से खुद को शांत करने लगी, अपने आप को आईने में एक स्टॉकर कि तरह देख रही थी और मुझे खुद पर हंसी भी बहुत आ रही थी, शायद मैंने कभी ऐसा सोचा ही नहीं था की मैं किसी का पीछा करूंगी पर आपके सोच के हिसाब से आपकी ज़िंदगी चले ऐसा जरूरी तो नहीं है। ज़िन्दगी में कौन से रास्ते किस मंज़िल की तरफ ले जाती है किसे पता होता है। उम्र में वह मुझसे बहुत छोटी दिख रही थी करीब बीस-बाइस साल की । उसमें मैं खुद को देख पा रही थी, जब उसके उम्र की थी तो मैं भी ठीक उसकी ही तरह थी बेचैन, बेबाक, बेपरवाह, पागल, बेवकूफ और साथ में एक दर्ज़े की बदतमीज़ भी जो वो नहीं थी।
उसका पीछा करते करते मैं दुर्गाकुंड के ना जाने किस गली में घुस गई, जहां से वापस लौट कर जाने का रास्ता भी नहीं पता था मुझे। पर यह गलियाँ काफी अजाइब थी, नुक्कड़ पर एक कुत्ता चीख चीख कर रो रहा था, तो गली में दुकान लैंप की रोशनी से चल रही होती,एक औरत अपने मर्द से किसी बात पर लड़ रही थी और बिना रुके गालियों की बौछार कर रही थी, नलके से पानी की टप टप पर किसी का ध्यान नहीं था, यहाँ की औरतें सायें की तरह चुप हो कर ना जाने किस से बच बच कर निकल रहीं होती, एक खिड़की से पूजा की आरती सुनाई देती तो एक बंद कमरे से अध नंगे जिस्मों की आवाज़ें सुनने को कुछ लोग बाहर इकट्ठा हो कर लुत्फ़ उठा रहे थे।
मुझे समझ नहीं आ रहा था यहाँ ऐसी जगह इतनी शाम में यह लड़की अकेले बेफिक्र हो कर कैसे आ गई, क्या इसे डर नही लगता, या डर लगने को कुछ बचा ना हो, मुझे उस पर गुस्सा भी आ रहा था, और रोना भी अगर यह मेरी छोटी बहन होती तो मैं इससे खींच के दो थप्पड़ मार कर ले जाती यहाँ से। पर ऐसा बोलने वाली मैं कोई नहीं होती, क्योंकि मुझे रत्ती भर अंदाज़ा नहीं था उसके घोर अंधेरे का, क्या पता वो खुद किसी आवाज़ को पुकार रही हो। मकान नंबर 243 के अंदर वह घुस जाती है अब इसके आगे जाने में मुझे डर भी लग रहा था की कहीं वह जान ना जाए, पर इतना आगे आ कर मैं पीछे जाना नहीं चाहती थी शायद उसे मेरी जरूरत थी। मैं उसके पीछे चलते चलते चौथे मंजिले पर पहुंच गई वह कमरे के अंदर घुसी और दरवाजा बंद कर लिया। अब मैं करती भी तो करती क्या, बगल में एक खिड़की थी तो किसी भी तरह से मैं उसके अंदर देखने की कोशिश कर रही थी, उस कमरे में उसके अलावा एक लड़का और था जो उसके उप्पर चीखे जा रहा था "तू साली 5 मिनट में आने वाली थी, किसके साथ थी, मेरे से मन नहीं भरता जो किसी और के साथ सोने चली गई" इतने में वह उसके बालों को पकड़ता और उसे जोर से धक्का मरता,फिर उसे बेड पर पटक कर उर्यानी कर के अपने बेल्ट से मार रहा था, और फिर उस पर बर्फ की पट्टी लगा रहा था।
यह सब देख कर मेरे आँखों से आँसू की बूंदे बहने लगी, मैं समझ नही पा रही थी कि उसे उसके आँखों मे हैवान नज़र नहीं आ रहा था, वो ऐसी ज़िंदा लाश बन चुकी थी जिसके मुँह से चीखें भी नहीं निकल पा रही थी। मैं उसे रोकना चाहती थी उस लड़की को बचाना चाहती थी पर कैसे, क्या यह उसकी मर्जी थी क्योंकि वह ऐसे हैवान के पास आई भी तो खुद थी, पर दुनिया को कोई भी यह मर्ज़ी से तो अपने साथ नहीं होने देगा, क्या उसकी कोई मजबूरी है,या उसमें हिम्मत नहीं है, यह सारे सवाल मुझे खाते जा रहे थे और वहाँ अंदर वह आदमी हैवानियत की सारी हदें पार करते जा रहा था।
मैं रोते- रोते वहीं बैठ गई, और उसके पन्ने को खोल कर पढ़ने लगी, बहुत खूबसूरत हैंडराइटिंग थी उसकी बड़े बड़े अक्षरों में उस पर एक लाइन लिखा हुआ था "हर फूल यहाँ पर कुचल गया, हर मोती यहाँ बिखर गया, जिस्म को नोच कर रूह को लाश बना गया" उस पन्ने पर लिखी यह लाइन  पढ़ कर मैं उठी अपने बैग में रखे चाकू को निकाला और दरवाज़ा जोर जोर से पीटने लगी। काफी देर पीटने के बाद उस लड़के ने दरवाज़ा खोला और मैंने बिना सोचे समझे उसके शरीर के सबसे कमज़ोर हिस्से पर वार किया जिससे वह हैवान अपने आप को मर्द समझता था, और चाकू की नोक उसके गर्दन पर रख कर उसे मारते गई, तब तक मारती गई जब तक वह अपने घुटने तले बैठ के खून की बौछारे ना छोड़ने लगा ऐसा लगा कोई ख़ब्त सवार हो गया हो मुझ पर।
उस लड़की की तरफ देखने की हिम्मत नहीं थी मुझमें, उसकी मर्जी जो नहीं जानती थी। उसकी तरफ देखते ही वह रो पड़ी जैसे बड़े लंबे वक्त बाद इन आँसुओं को उसने बेहने की इजाज़त दी हो, मैंने उसे कपड़े पहनाए और वहाँ से ले आई, बदले में वह मेरा हाथ पकड़ कर चलती गई बिना कोई सवाल पूछे बिना इनकार किए।
उस खौफ़नाक दुनिया से बाहर निकलते ही मैंने कैब बुक किया, उसे बैठाया खुद बैठी और दो सिगरेट जलाई एक उसे दिया और एक खुद फुकने लगी ना मैंने उससे कुछ पूछा ना उसने, दोनों ही अपनी अपनी खिड़की से बाहर देखने लगे।
 शहर के सो जाने के बाद शहर कितना सन्नाटा हो जाता है कि संन्नाटे की चीख किसी को सुनाई नहीं देती। यह आज़ादी की हवा जो चेहरे पर पड़ रही थी पहली बार इससे चोट नहीं खुशी महसूस हो रही थी।

-आकांक्षा

Comments

  1. मैंम आपको पढ़ना मैं हमेशा से पसन्द करता रहा हूँ।आप कहानी लिखते समय बिल्कुल बांध कर रखती है पाठकों को। बधाई मैंम जी आपको।

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  2. Such a wonderful concept...loved it

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  3. मैं तुम्हें आने वाले समय में एक प्रबुद्ध लेखिका के तौर पर देख रहा हूं

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